ट्यूशन वाला प्यार
दसवीं क्लास। मैथ्स ट्यूशन। शाम 6 से 7:30। शर्मा सर के घर का छोटा सा कमरा — 15 बच्चे, तीन लंबी बेंचें। पंखा धीमा, लाइट पीली। अनुज हमेशा दूसरी बेंच पर बैठता। और उस बेंच के दूसरे कोने पर — तन्वी। तन्वी brilliant थी — हर सवाल का जवाब सबसे पहले। अनुज average था — पर तन्वी के बग़ल बैठने के बाद से "ज़्यादा ध्यान" लगाने लगा। असल में ध्यान मैथ्स में नहीं, तन्वी में लगता था। जैसे वो concentration से सवाल हल करती — होंठ दबाकर, माथे पर बल, पेंसिल मुँह में। और जब सवाल हल हो जाता — एक छोटी सी मुस्कान। अनुज ने एक दिन हिम्मत जुटाई — "ये सवाल समझा दोगी?" तन्वी ने देखा। "तू ध्यान नहीं देता इसीलिए। चल, दिखा।" उसने समझाया। इतना अच्छा कि अनुज को सच में समझ आ गया। "थैंक्यू। तुम सर से अच्छा पढ़ाती हो।" "हाँ, पर मैं तेरे पैसे नहीं लूँगी," तन्वी ने कहा। ऐसे शुरू हुआ — हर क्लास के बाद 10 मिनट extra। "डाउट्स" के नाम पर। पर बातें मैथ्स से निकलकर बाक़ी सबकुछ पर पहुँच जातीं। बोर्ड्स आए। दोनों ने अच्छे मार्क्स लाए। रिज़ल्ट वाले दिन, अनुज ने तन्वी को मैसेज किया (उस ज़माने का Nokia — T9 typing): "maths mein 85 aaye. tere wajah se. thank u." तन्वी ने रिप्लाई किया: "sirf maths mein? ;)" अनुज ने लिखा: "nahi. life mein bhi." तन्वी ने कुछ देर बाद भेजा: "same here. :)" वो "same here" — अनुज ने आज तक save करके रखा है। फ़ोन बदल गया, पर screenshot है। ग्यारहवीं में दोनों अलग स्कूल गए। मिलना बंद हो गया। ज़िंदगी आगे बढ़ी। पर अनुज आज भी, जब कोई मैथ्स का सवाल देखता है — एक पल के लिए मुस्कुराता है। क्योंकि मैथ्स ने उसे सिर्फ़ नंबर नहीं, पहला प्यार दिया।