किताबों की दुकान वाला प्यार
वाराणसी। गोदौलिया चौक के पास एक पुरानी किताबों की दुकान — "शब्द संसार"। निधि हर रविवार आती — पुरानी हिंदी किताबें ढूँढने। प्रेमचंद, धर्मवीर भारती, मन्नू भंडारी — ये उसकी दुनिया थी। दुकान का मालिक एक बूढ़ा आदमी था — शर्मा जी। उनका पोता विक्रम दुकान सँभालता था। 25 साल का, पतला, चश्मा, और हमेशा किसी न किसी किताब में डूबा हुआ। पहली बार जब निधि ने "गुनाहों का देवता" माँगी, विक्रम ने कहा — "ये किताब पढ़ने से पहले रूमाल रख लीजिए। रोएँगी।" "मैं रोती नहीं किताबें पढ़कर।" "सब कहते हैं। फिर लौटकर रोती आँखों से आते हैं।" निधि ने किताब ली। अगले रविवार लौटी — आँखें हल्की लाल। "रोई?" विक्रम ने पूछा। "... थोड़ा।" विक्रम हँसा। "अगली बार 'आधा गाँव' ट्राई करिए। उसमें भी रोएँगी, पर अलग तरह से।" ऐसे शुरू हुआ — हर हफ़्ते एक किताब, एक सिफ़ारिश, और दस मिनट की बातचीत। दस मिनट बीस बने, बीस तीस बने। एक दिन विक्रम ने कहा — "एक किताब है जो मैंने ख़ुद लिखी है। पढ़ोगी?" उसने एक पतली सी हाथ से बँधी कॉपी दी। "ये शॉर्ट स्टोरीज़ हैं।" निधि ने घर जाकर पढ़ी। हर कहानी में एक लड़की थी — जो किताबें पढ़ती थी, जो रविवार को आती थी, जिसकी हँसी दुकान में गूँजती थी। अगले रविवार, निधि दुकान में आई और बोली — "तुम्हारी किताब की वो लड़की... वो मैं हूँ ना?" विक्रम का चेहरा लाल हो गया। "वो... बस... कल्पना है..." "कल्पना में भी इतना ध्यान? मेरे चश्मे का रंग तक सही लिखा है।" विक्रम चुप। फिर बोला — "हाँ, वो तुम हो। हर किरदार तुम हो।" निधि मुस्कुराई। "तो अगली कहानी साथ लिखें?" आज दोनों उसी दुकान को साथ चलाते हैं। शर्मा जी रिटायर हो गए। दुकान का नाम बदल दिया — "शब्द संसार" से "दो शब्द" कर दिया। दीवार पर एक बोर्ड लगा है: "यहाँ किताबें बिकती हैं, और कभी-कभी प्यार भी हो जाता है।"