गुल्लक में छुपा प्यार
नौवीं क्लास। आरती और सौरभ — एक ही मोहल्ले, एक ही स्कूल, एक ही ट्यूशन। सौरभ के पास एक मिट्टी की गुल्लक थी — गुलाबी रंग की, हाथी के शेप की। उसमें वो हर दिन दो रुपये डालता था। "किसलिए जमा कर रहा है?" आरती ने एक दिन पूछा। "बताऊँगा। बाद में।" आरती को curiosity थी पर सौरभ बताता नहीं था। छह महीने बीते। गुल्लक भारी हो गई। आरती का जन्मदिन आया — 14 फ़रवरी। Valentine's Day। (हाँ, सच में।) सुबह स्कूल में, सौरभ ने एक छोटा सा पैकेट दिया — अख़बार में लपेटा हुआ। "ये क्या है?" "खोलो।" आरती ने खोला। एक चाँदी की पायल — पतली, नाज़ुक, एक छोटी सी घंटी वाली। "ये... मेरे लिए?" "छह महीने से पैसे जमा कर रहा था। गुल्लक तोड़ी आज। 360 रुपये थे। पायल 350 की मिली।" आरती की आँखें भर आईं। "सौरभ, तूने रोज़ दो रुपये..." "स्कूल कैंटीन में समोसा नहीं खाया छह महीने। तेरे लिए।" आरती हँसी — और रोई — एक साथ। वो पायल — आरती ने उस दिन पहनी और फिर कभी उतारी नहीं। दसवीं बोर्ड्स में भी पहनी थी। बारहवीं में भी। कॉलेज में भी। सौरभ और आरती — दसवीं के बाद अलग स्कूल गए। कॉलेज अलग शहर। मिलना बंद, बात बंद। पर वो पायल — आज भी आरती के पैर में है। 15 साल बाद। चाँदी काली पड़ गई है, घंटी की आवाज़ धीमी हो गई है — पर है। आरती की बेटी पूछती है — "मम्मा, ये पुरानी पायल क्यों नहीं उतारती?" आरती मुस्कुराती है — "ये पुरानी नहीं है, बेटा। ये सबसे क़ीमती है।" 360 रुपये। एक मिट्टी की गुल्लक। छह महीने का समोसा। और एक प्यार — जो आज भी पैरों में छनकता है।