पहली मुलाक़ात — पहला प्यार
ग्यारहवीं क्लास। नया स्कूल। नया शहर। कोई दोस्त नहीं। रिया ने क्लासरूम में एंटर किया। सारी सीटें भरी थीं — सिवाय एक के। आख़िरी बेंच, खिड़की के पास। वहाँ पहले से एक लड़का बैठा था। सिर झुकाए, कॉपी में कुछ बना रहा था। "यहाँ बैठ सकती हूँ?" रिया ने पूछा। उसने सिर उठाया। भूरी आँखें, बिखरे बाल। "हाँ," बस इतना कहा। पहला हफ़्ता — एक शब्द नहीं बोला। रिया को लगा शायद रूड है। पर फिर एक दिन, मैथ्स के पीरियड में, रिया को एक सवाल समझ नहीं आया। वो परेशान थी। चुपचाप, उसने अपनी कॉपी रिया की तरफ खिसकाई। उसमें वो सवाल स्टेप-बाय-स्टेप हल था — बिल्कुल साफ़ लिखावट में। रिया ने देखा और मुस्कुराई। उसने भी मुस्कुराया — पहली बार। "तुम्हारा नाम?" रिया ने पूछा। "देव।" देव कम बोलता था, पर जब बोलता था तो हर बात में गहराई थी। वो स्केच बनाता था — बहुत ख़ूबसूरत। एक दिन रिया ने उसकी कॉपी देखी — उसमें एक चेहरा बना था। खिड़की से बाहर देखती एक लड़की। "ये... ये मैं हूँ?" रिया ने पूछा। देव का चेहरा लाल हो गया। "वो... बस यूँ ही..." रिया ने वो पन्ना फाड़कर रख लिया। "ये मेरा। मुझे पसंद आया।" बारहवीं में, बोर्ड्स से पहले, देव ने रिया को एक लेटर दिया: "मैं बोलना नहीं जानता। पर तुम्हारे लिए लिखना सीख लिया। तुम मेरा पहला प्यार हो। शायद आख़िरी भी।" रिया ने कुछ नहीं कहा। बस उसका हाथ पकड़ लिया। बोर्ड्स ख़त्म हुए। दोनों अलग कॉलेज गए। ज़िंदगी बदली। लोग बदले। पर दोनों के दिलों में एक कोना वही रहा — आख़िरी बेंच, खिड़की के पास। दस साल बाद, एक आर्ट एक्ज़िबिशन में रिया गई। दीवार पर एक बड़ी सी पेंटिंग — खिड़की से बाहर देखती एक लड़की। नीचे आर्टिस्ट का नाम — देव। रिया की आँखों से आँसू बह गए। पेंटिंग के नीचे लिखा था: "पहला प्यार — हमेशा के लिए।"
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