रंगों का इश्क़ — होली की कहानी
जयपुर। होली का दिन। पूरा शहर रंगों में डूबा हुआ। आरव अपने दोस्तों के साथ निकला था — हाथ में पिचकारी, चेहरे पर गुलाल। सड़कों पर ढोल बज रहे थे, लोग नाच रहे थे। तभी — एक रंग उसके चेहरे पर आकर लगा। पीला रंग। सामने एक लड़की खड़ी थी — सफ़ेद कुर्ती जो अब इंद्रधनुषी हो चुकी थी, बालों में गुलाबी रंग, और चेहरे पर शरारती मुस्कान। "हैप्पी होली!" उसने कहा। आरव ने भी रंग उठाया और उसके गाल पर लगा दिया — हरा। "हैप्पी होली!" "तुमने मेरे बाल ख़राब कर दिए!" उसने कहा। "तुमने पहले मारा!" दोनों हँसने लगे। भीड़ में, ढोल की आवाज़ में, रंगों के बीच। उसका नाम मीनाक्षी था। राजस्थान यूनिवर्सिटी में आर्ट्स की स्टूडेंट। पेंटिंग करती थी। आरव इंजीनियरिंग में था। दोनों की दुनिया अलग — पर रंग दोनों को पसंद थे। होली के बाद भी मिलना जारी रहा। मीनाक्षी उसे अपनी पेंटिंग्स दिखाती — abstract, vibrant, ज़िंदा। आरव कहता, "मुझे कुछ समझ नहीं आता।" "प्यार में भी कुछ समझ नहीं आता, फिर भी हो जाता है," मीनाक्षी जवाब देती। एक दिन मीनाक्षी ने एक बड़ी कैनवस पर काम शुरू किया — बताया नहीं क्या बना रही है। हफ़्तों तक। कॉलेज की आर्ट एक्ज़िबिशन में वो पेंटिंग लगी — दो सिल्हूएट, रंगों में डूबे, एक-दूसरे के सामने। बैकग्राउंड में होली के रंग। टाइटल: "पहला रंग।" आरव ने देखा और समझ गया। "ये हम हैं?" मीनाक्षी ने सिर हिलाया। "हर पेंटिंग में एक कहानी होती है। ये मेरी सबसे ख़ूबसूरत कहानी है।" आरव ने वो पेंटिंग ख़रीद ली — पूरी बचत लगाकर। आज वो पेंटिंग उनके ड्रॉइंग रूम में टँगी है। और हर होली पर, सबसे पहला रंग वो एक-दूसरे को लगाते हैं — ठीक वैसे ही, जैसे उस पहली होली पर लगाया था।