वो आख़िरी मुलाक़ात
रेलवे स्टेशन। प्लेटफ़ॉर्म नंबर 3। ट्रेन 20 मिनट में थी। सिद्धार्थ और काव्या — दोनों जानते थे कि ये आख़िरी बार है। सिद्धार्थ को विदेश जाना था — MS करने। दो साल। शायद ज़्यादा। काव्या यहीं रहने वाली थी — CA की तैयारी। दो साल की रिलेशनशिप। कॉलेज की। जहाँ हर दिन साथ था, हर शाम कैंटीन, हर रात फ़ोन पर। पर दोनों ने decide किया था — "लॉन्ग डिस्टेंस नहीं करेंगे। ज़्यादा तकलीफ़ होगी।" ये rational decision था। mature था। सही था। पर प्लेटफ़ॉर्म पर खड़े होकर — सही लग नहीं रहा था। "सामान सब है?" काव्या ने पूछा। आवाज़ में कंपन था, पर रो नहीं रही थी। "हाँ।" "जैकेट ले ली? वहाँ ठंड होगी।" "ले ली।" "खाना ट्रेन में..." "काव्या।" "हाँ?" "रो लो। मना मत करो।" काव्या की आँखों से आँसू बह गए। सिद्धार्थ ने गले लगाया। प्लेटफ़ॉर्म पर, लोगों के बीच, बिना किसी शर्म के। "मैं तुम्हें कभी नहीं भूलूँगा," सिद्धार्थ ने कहा। "ये मत बोलो। भूलना ज़रूरी है। नहीं तो जी नहीं पाओगे।" "मैं नहीं भूल सकता।" "तो याद रखना। पर आगे बढ़ना।" ट्रेन आ गई। सिद्धार्थ चढ़ा। खिड़की से काव्या को देखा — वो हाथ हिला रही थी, मुस्कुरा रही थी, और आँसू बह रहे थे। ट्रेन चली। काव्या छोटी होती गई — फिर बस एक बिंदु — फिर कुछ नहीं। दो साल बीते। सिद्धार्थ ने MS पूरी की। नौकरी मिली। ज़िंदगी बन गई। काव्या CA बन गई। शादी हुई। बच्चा हुआ। ज़िंदगी बन गई। दोनों ख़ुश हैं — सच में ख़ुश। किसी और के साथ। पर कभी-कभी — रेलवे स्टेशन पर, ट्रेन की सीटी सुनकर — दोनों एक पल के लिए रुक जाते हैं। एक पल। बस। फिर आगे बढ़ जाते हैं। क्योंकि पहला प्यार भुलाया नहीं जाता — बस, रख दिया जाता है। संभालकर।