स्कूल बस की खिड़की
स्कूल बस नंबर 7। रूट: वसंत विहार से स्कूल। आठवीं क्लास। निशा हमेशा तीसरी रो, खिड़की वाली सीट पर बैठती। और सामने वाली रो में — एक लड़का जो हमेशा पलटकर पीछे देखता था। शुरू में निशा को लगा वो अपने दोस्त से बात कर रहा है। पर उसका दोस्त तो दूसरी तरफ बैठता था। एक दिन निशा ने सीधे देख लिया — और लड़का झट से मुड़ गया। कान लाल। निशा को हँसी आ गई। अगले दिन उसने ये experiment किया — जब भी वो पलटे, निशा उसे देख ले। तीन बार — तीनों बार लड़का पकड़ा गया। तीसरे दिन, निशा ने एक छोटी सी चिट बनाई और उसकी सीट के नीचे गिरा दी। लिखा था: "पीछे मुड़कर क्या देखते हो? 😊" शाम को बस में वो चिट वापस आई: "खिड़की से बाहर का नज़ारा अच्छा दिखता है। 😄" निशा ने लिखा: "खिड़की तो मेरी तरफ है, बाहर नहीं।" जवाब आया: "मुझे पता है। 😊" निशा का दिल धक से हो गया। आठवीं क्लास — पहली बार किसी ने इतनी प्यारी बात कही। उसका नाम आर्यन था। दोनों स्कूल बस चिट्ठी क्लब बन गए — रोज़ एक चिट, आगे-पीछे। बातें — स्कूल, टीचर्स, होमवर्क, सपने। एक बार आर्यन ने लिखा: "बड़ा होकर क्या बनना है?" निशा ने लिखा: "डॉक्टर। तुम?" "जो भी बनूँ — तेरे पास रहूँ बस।" निशा ने वो चिट आज भी रखी है — डायरी के आख़िरी पन्ने पर। दसवीं के बाद आर्यन का परिवार बैंगलोर शिफ़्ट हो गया। ना फ़ोन, ना पता। 2008 था — Facebook अभी नया-नया था। निशा सच में डॉक्टर बन गई। आज AIIMS में है। पिछले साल, LinkedIn पर एक कनेक्शन रिक्वेस्ट आई — "Aryan Mehra, Software Engineer, Bangalore." मैसेज: "Bus number 7, third row, window seat. Still there?" निशा ने रिप्लाई किया: "Waiting. 16 years late ho tum."