छत पर चाँदनी
पुरानी दिल्ली की एक तंग गली। दो मकान — दीवार से दीवार सटे हुए। बीच में सिर्फ़ दो फ़ीट का गैप। ज़ायरा हर रात छत पर आती थी — तारे देखने। उसे शहर की रोशनी में तारे कम दिखते थे, पर वो ढूँढती रहती। एक रात, बग़ल वाली छत से आवाज़ आई — कोई गिटार बजा रहा था। "तुम ही हो" का धुन। "कौन है?" ज़ायरा ने पूछा। "तुम्हारा पड़ोसी। फ़रहान।" आवाज़ आई। अँधेरे में चेहरा नहीं दिखा। "इतनी रात को गिटार?" "इतनी रात को छत पर कौन आता है?" दोनों हँसे। और बस, शुरू हो गया सिलसिला। हर रात — दो छतें, दो फ़ीट का फ़ासला, और घंटों बातें। चाँदनी में एक-दूसरे की सिर्फ़ आउटलाइन दिखती — चेहरे धुँधले। पर आवाज़ें साफ़ थीं, हँसी गूँजती थी। ज़ायरा ने एक रात कहा — "मैंने तुम्हारा चेहरा ठीक से नहीं देखा।" "तो क्या? तुमने मेरी बातें सुनी हैं। चेहरे बदलते हैं, बातें नहीं।" "बहुत फ़िल्मी बात मारते हो।" "तुम्हारे लिए सीखा है।" तीन महीने — हर रात, बिना एक रात गैप। बारिश में भी, सर्दी में भी। ज़ायरा चाय लाती, एक कप उसकी छत पर रख देती — गैप इतना कम था कि हाथ बढ़ाकर दे सकती थी। एक रात फ़रहान ने कहा — "कल सुबह 10 बजे, नीचे गली में। पहली बार ठीक से मिलते हैं?" ज़ायरा का दिल ज़ोर से धड़का। "ठीक है।" सुबह 10 बजे। ज़ायरा ने दरवाज़ा खोला और बाहर निकली। फ़रहान सामने खड़ा था — लंबा, पतला, बिखरे बाल, और वही मुस्कान जो उसने अँधेरे में हज़ार बार महसूस की थी। "सलाम, ज़ायरा।" "सलाम, फ़रहान।" दोनों ने एक-दूसरे को देखा — और हँसने लगे। क्योंकि दोनों जानते थे कि प्यार तो तीन महीने पहले हो चुका था — बिना चेहरा देखे, बस आवाज़ और बातों से। आज दोनों शादीशुदा हैं। और हर रात, चाहे कितनी भी थकान हो — छत पर ज़रूर जाते हैं।