अधूरी ग़ज़ल — उसके जाने के बाद
वो गई तो क्या गया — पूछो मत, बस इतना जानो कि दिसम्बर में भी ज़्यादा सर्दी लग रही है। वो गई तो शहर वही है, गलियाँ वही हैं, चाय की दुकान वही है — पर सब अजनबी लगता है, जैसे subtitles बिना foreign film। कभी उसकी favourite song बजती है Radio पर — बिन बुलाए — और मैं volume बढ़ा देता हूँ, जैसे आवाज़ बढ़ाने से वो सुन लेगी, कहीं से भी। लोग कहते हैं — "Time heals." झूठ। Time बस आदत बना देता है — दर्द वही रहता है, बस चीखना बंद हो जाता है। यह ग़ज़ल अधूरी है — जैसे वो कहानी अधूरी थी। जैसे वो चाय अधूरी थी जो उसने आख़िरी दिन छोड़ दी — आधी पीकर। मक़्ता लिखूँ तो कैसे? ग़ज़ल पूरी करने के लिए उसका होना ज़रूरी है। और वो — वो अब किसी और की ग़ज़ल है।