तेरे नाम की कविता
तेरा नाम लिखता हूँ तो कलम मुस्कुराती है — जैसे शब्दों को भी पता है कि यह नाम ख़ास है। तेरा नाम लेता हूँ तो ज़ुबान पर शहद घुलता है — और हवा ठहर जाती है सुनने के लिए। तेरा नाम सोचता हूँ तो दिल एक बार extra धड़कता है — जैसे कोई गाना बीच में एक bonus note दे दे। लोग कहते हैं नाम में क्या रखा है — उन्होंने तेरा नाम नहीं लिया। तेरा नाम — वो दुआ है जो बिना माँगे मिली, वो कहानी है जो बिना लिखे बनी, वो धुन है जो बिना सुने याद है। और मैं? मैं बस वो इंसान हूँ जिसकी हर कविता का पहला और आख़िरी शब्द एक ही है — तू।