सात फेरे, अधूरे
शादी के mandap में चार फेरे हो चुके थे जब अंजलि ने विक्रम की आँखों में देखा। उसकी आँखें कह रही थीं — "मैं तैयार नहीं हूँ।" अंजलि समझ गई। वो दो साल से समझ रही थी। विक्रम अच्छा इंसान था — kind, caring, responsible। पर प्यार? प्यार एक commitment नहीं था जो तुम इसलिए निभाओ क्योंकि दोनों families को ख़ुशी होगी। पाँचवाँ फेरा शुरू हुआ। पंडित जी मंत्र पढ़ रहे थे। अंजलि ने धीरे से कहा — सिर्फ़ विक्रम को सुनाई दे, इतनी धीमी आवाज़ में — "रुको।" विक्रम ने देखा। "तुम ख़ुश नहीं हो," अंजलि ने कहा। "मैं भी नहीं हूँ। हम ग़लत कारणों से सही काम कर रहे हैं।" "सब देख रहे हैं, अंजलि," विक्रम ने फुसफुसाया। "हमेशा सब देखते रहेंगे। सवाल ये है कि हम क्या देखना चाहते हैं — पचास साल बाद जब इस moment को याद करें।" Silence। मंडप में 300 लोग बैठे थे। A/C की हम्म। शहनाई बज रही थी। विक्रम ने गहरी साँस ली। "तुम सही कह रही हो।" बाकी के तीन फेरे कभी पूरे नहीं हुए। लोगों ने बहुत कहा — "ज़माना क्या कहेगा।" "इज़्ज़त का सवाल है।" "पागल हो गए दोनों।" पर अंजलि आज इटली में food photography सीख रही है। विक्रम ने अपना NGO शुरू किया है। दोनों अकेले हैं। दोनों ख़ुश हैं। और सात फेरे अधूरे हैं — पर ज़िन्दगी पूरी।