पुस्तकालय वाला प्यार
केंद्रीय पुस्तकालय, भोपाल। तीसरी मंज़िल। हिंदी साहित्य वाला section। हर शनिवार, शाम चार बजे, एक लड़की आती थी। चुपचाप। प्रेमचंद उठाती, कोने वाली कुर्सी पर बैठती, और घंटों पढ़ती। कभी-कभी किताब पर उँगली फेरती — जैसे शब्दों को छू रही हो। मैं उसे तीन महीने से देख रहा था। मेरा section भी वही था — पर मैं पढ़ता कम था, उसे देखता ज़्यादा। एक दिन हिम्मत हुई। मैंने एक पर्ची लिखी और उसकी किताब में दबा दी — वो जहाँ तक पढ़कर रखती थी, bookmark की जगह। पर्ची पर लिखा था: "गोदान पढ़ रही हो? अंत दुखद है। पर कभी-कभी दुखद अंत वाली कहानियाँ सबसे ज़्यादा याद रहती हैं।" अगले शनिवार — किताब उसी जगह रखी थी। पर्ची ग़ायब। उसकी जगह एक नई पर्ची: "गोदान का अंत दुखद नहीं है। वो ईमानदार है। और ईमानदारी हमेशा दुखद लगती है — पहली बार में।" मैं मुस्कुराया। अगली पर्ची लिखी: "आपसे मिलकर अच्छा लगा — बिना मिले।" जवाब आया: "बिना मिले मिलना — यही तो किताबों का जादू है। और शायद पुस्तकालयों का भी।" छह महीने तक यह सिलसिला चला। दो अजनबी — जो हर शनिवार मिलते थे बिना बात किए, बस पर्चियों से। उसने मुझे भगवती चरण वर्मा पढ़ाया। मैंने उसे शरतचंद्र। सातवें महीने — वो नहीं आई। आठवें में भी नहीं। किताब रखी थी — आख़िरी पर्ची के साथ: "Transfer हो गया है। जा रही हूँ। पर यह जान लो — तुमने मुझे फिर से पढ़ना सिखाया। शब्दों को नहीं — इंसानों को। शुक्रिया।" नाम नहीं लिखा था। नंबर नहीं। कोई पता नहीं। बस एक bookmark छोड़ा था — सूखा हुआ गुलाब का पत्ता। आज भी मेरे पास है। और हर शनिवार, शाम चार बजे, मैं उसी कुर्सी पर बैठता हूँ। प्रेमचंद पढ़ता हूँ। और सोचता हूँ — कुछ कहानियाँ अधूरी ही सुंदर होती हैं।