बारिश में तेरा साथ
मुम्बई की बारिश का कोई भरोसा नहीं। और उस शाम तो जैसे आसमान ने ठान लिया था कि शहर को डुबो देगा। मैं चर्चगेट स्टेशन के बाहर खड़ा था — बिना छाते, बिना उम्मीद। लोकल बंद थी, कैब मिल नहीं रही थी, और phone की battery भी जवाब दे चुकी थी। तभी कंधे पर एक छाते की छाया आई। "अकेले भीगना है या share करेंगे?" — एक आवाज़, थोड़ी हँसती हुई, थोड़ी गर्म। मैंने मुड़कर देखा। काले बालों पर बारिश की बूँदें, आँखों में शरारत, और हाथ में एक छोटा सा पीला छाता जो दो लोगों के लिए काफ़ी नहीं था। "छाता छोटा है," मैंने कहा। "तो क़रीब आ जाइए," उसने बड़ी सहजता से कहा। हम चलने लगे — बिना यह जाने कि कहाँ जा रहे हैं। बातें शुरू हुईं बारिश से, फिर मुम्बई से, फिर ज़िन्दगी से। उसका नाम तान्या था। पत्रकार थी। बोलती ऐसे थी जैसे हर वाक्य एक headline हो। स्टेशन के पास एक tapri पर रुके। cutting chai पी। बारिश थम ही नहीं रही थी, और सच कहूँ तो मैं चाहता भी नहीं था कि थमे। "तुम्हारा नंबर?" मैंने पूछा, हिम्मत जुटाकर। उसने हँसकर कहा, "Phone तो मेरा भी dead है। कल इसी वक़्त, इसी tapri पर?" और मैं अगले दिन आया। और अगले दिन भी। और उसके बाद भी। तीन महीने तक रोज़ उसी tapri पर, उसी वक़्त। कभी वो आई, कभी नहीं। पर जब आती थी — मुम्बई की सबसे खूबसूरत शाम होती थी। फिर एक दिन वो नहीं आई। अगले दिन भी नहीं। एक हफ़्ता बीत गया। मैं आज भी उसी tapri पर जाता हूँ। चाय पीता हूँ। बारिश का इंतज़ार करता हूँ। क्योंकि मुम्बई की बारिश ने जो दिया, शायद वही वापस ले ले।