वो आख़िरी ख़त
उसने आख़िरी ख़त लिखा और मोड़कर किताब में रख दिया। किताब वही थी जो उसने मुझे दी थी -- 'गुनाहों का देवता'। उसमें एक लाइन underline थी: 'जो प्यार अधूरा रहता है, वो सबसे ख़ूबसूरत होता है।' मैंने वो किताब दस साल बाद खोली जब पुरानी अलमारी साफ़ कर रहा था। ख़त गिरा। हाथ काँपे। उसकी लिखावट वैसी ही थी -- साफ़, सुन्दर, ज़िद्दी। 'तुमने कभी पूछा नहीं कि मैं क्यों चली गई। शायद तुम्हें जवाब से डर लगता था। सच यह है कि मैं इसलिए गई क्योंकि तुम्हारे साथ रहकर मैं वो नहीं बन पाती जो मुझे बनना था। और तुम भी नहीं। प्यार कभी-कभी छोड़ने में होता है, पकड़ने में नहीं।' मैंने किताब बंद की। ख़त वापस रखा। कुछ कहानियाँ अधूरी ही अच्छी लगती हैं।