रैगिंग से प्यार तक
कॉलेज का पहला दिन। फ़्रेशर्स। मयंक कैंपस में घुसा — बैग कंधे पर, आँखों में डर। सीनियर्स की रैगिंग का नाम सुनकर ही पसीने छूट रहे थे। कैंटीन के पास एक सीनियर ने रोका — "ए फ़्रेशर! नाम बता।" "म-म-मयंक।" "हड्डकपाओ। यहाँ आ। तेरी रैगिंग होगी।" मयंक काँपने लगा। तभी एक लड़की आई — सीनियर ही, पर अलग। शांत चेहरा, गंभीर आँखें। "छोड़ इसे, रवि। पहले दिन है बेचारे का," उसने कहा। "अरे तू जा ना, प्राची। हम बस मज़ाक कर रहे हैं।" प्राची ने मयंक को देखा। "चल, मेरे साथ। ये लोग ज़्यादा कुछ नहीं करेंगे।" मयंक प्राची के पीछे-पीछे चला गया। प्राची ने कैंटीन में बैठाया, चाय मँगवाई। "डरने की ज़रूरत नहीं। ये बस शोर मचाते हैं।" "थैंक्यू, दीदी।" प्राची ने घूरकर देखा। "दीदी मत बोल। सिर्फ़ दो साल बड़ी हूँ।" वहाँ से शुरू हुआ। प्राची ने मयंक को कॉलेज सिखाया — कौन सा प्रोफ़ेसर अच्छा है, कैंटीन में क्या मत खाओ, लाइब्रेरी में कौन सी सीट बेस्ट है। मयंक को लगा — ये बड़ी बहन जैसी है। पर धीरे-धीरे कुछ बदला। प्राची की हँसी अलग लगने लगी। उसका "बाय" कहना — दिल में कुछ करने लगा। दूसरे साल, प्राची फ़ाइनल ईयर में थी। कॉलेज छोड़ने वाली थी। फ़ेयरवेल की रात, मयंक ने हिम्मत जुटाई। प्राची के पास गया। "प्राची, एक बात कहनी है।" "बोल।" "पहले दिन तुमने मुझे बचाया था रैगिंग से। पर असली रैगिंग तुमने की — मेरे दिल की।" प्राची हँसी। "ये dialogue कहाँ से लाया?" "ख़ुद लिखा। रात भर सोचा।" प्राची ने मयंक का हाथ पकड़ा। "बुद्धू, मैं तो पहले दिन से जानती थी — तू मेरा है।" "फिर बताया क्यों नहीं?" "मज़ा आ रहा था तुझे परेशान देखकर।" आज मयंक सॉफ़्टवेयर इंजीनियर है, प्राची CA। दोनों साथ रहते हैं। और जब भी कोई पूछता है "कैसे मिले?" — प्राची कहती है, "इसकी रैगिंग ली थी मैंने।"