तुम मिलो तो — नज़्म
तुम मिलो तो बता दूँ कि कैसे गुज़रती हैं रातें तुम्हारे बिना, कि कैसे हर गाना तुम्हारा लगता है, कि कैसे भीड़ में भी तन्हाई काटती है। तुम मिलो तो बता दूँ कि तुम्हारी वो आख़िरी मुस्कान अभी तक मेरी पलकों पर टिकी है, कि तुम्हारे जाने के बाद कॉफ़ी का स्वाद बदल गया है, कि बारिश अब सिर्फ़ भिगोती है — सुकून नहीं देती। तुम मिलो तो पूछूँ कि क्या तुम्हें भी रात तीन बजे अचानक मेरी याद आती है? कि क्या तुम भी मेरा नाम लिखकर मिटाती हो? कि क्या तुम भी "I'm fine" कहते हुए थोड़ा सा झूठ बोलती हो? तुम मिलो तो कह दूँ कि मैंने बहुत कोशिश की भूलने की — पर तुम किसी किताब के उस पन्ने की तरह हो जिस पर से नज़र हटती नहीं, जो बार-बार खुलता है, जो दिल को हर बार नया लगता है। तुम मिलो तो बस इतना कहूँ — मुझे तुम्हारी ज़रूरत है। ये कमज़ोरी नहीं, ये इक़रार है। ये हार नहीं, ये प्यार है। बस तुम मिलो तो।