कैंटीन का वो टेबल
दिल्ली यूनिवर्सिटी। नॉर्थ कैंपस। कैंटीन का वो कोने वाला टेबल। सिमरन और आकाश — दोनों पॉलिटिकल साइंस में थे। पर पहली मुलाक़ात पॉलिटिक्स से नहीं, समोसे से हुई। कैंटीन में सिर्फ एक समोसा बचा था। दोनों ने एक साथ ऑर्डर दिया। "ये मेरा है, मैंने पहले बोला!" सिमरन ने कहा। "मैंने पहले काउंटर पर पैसे रखे!" आकाश ने जवाब दिया। कैंटीन वाले भैया ने समोसा आधा काटकर दोनों को दे दिया। वो आधा समोसा खाते हुए दोनों हँसने लगे। और उसी टेबल पर बैठकर बातें शुरू हुईं। आकाश को क्रिकेट पसंद था, सिमरन को शायरी। आकाश मूवीज़ देखता था, सिमरन डॉक्यूमेंट्रीज़। आकाश चाय पीता था, सिमरन कॉफ़ी। बिल्कुल उलट थे दोनों। पर कहते हैं ना — opposite attracts। तीन साल कॉलेज के — हर दिन उसी टेबल पर। परीक्षा की तैयारी भी वहीं, लड़ाई भी वहीं, मनाना भी वहीं। फ़ाइनल ईयर में आकाश ने उसी टेबल पर एक चिट रखी: "तीन साल पहले आधा समोसा बाँटा था। अब पूरी ज़िंदगी बाँटोगी?" सिमरन ने चिट पढ़ी। रोई। हँसी। फिर बोली — "बस शर्त एक है — समोसा हमेशा पूरा मिलेगा, आधा नहीं।" दोनों ने एक-दूसरे को गले लगाया। कैंटीन वाले भैया ने मुफ़्त में दो समोसे भेजे — इस बार पूरे। आज दोनों शादीशुदा हैं। दो बच्चे हैं। और हर सालगिरह पर वो उसी कैंटीन में जाते हैं — कोने वाले टेबल पर बैठकर समोसा खाते हैं। कैंटीन वाले भैया अब बूढ़े हो गए हैं। पर जब भी सिमरन और आकाश आते हैं, वो मुस्कुराकर कहते हैं — "आज भी आधा-आधा दूँ या पूरा?"