वो लाइब्रेरी वाली लड़की
कॉलेज की लाइब्रेरी। तीसरी मंज़िल। खिड़की के पास वाली सीट। अर्जुन हर शाम वहाँ आता — पढ़ने नहीं, बल्कि उसे देखने। वो लड़की जो हमेशा कोने वाली सीट पर बैठती थी। चुपचाप। किताबों में डूबी हुई। उसके बालों में हमेशा एक पेंसिल खोंसी होती थी। वो पढ़ते-पढ़ते होंठ हिलाती थी — जैसे किताब से बात कर रही हो। कभी-कभी अचानक मुस्कुराती — शायद कोई अच्छी लाइन पढ़ लेती। अर्जुन ने उसके बारे में सब कुछ नोटिस कर लिया था — पर उसका नाम नहीं जानता था। एक दिन, हिम्मत करके उसने एक चिट लिखी और उसकी किताब में रख दी — जब वो वॉशरूम गई थी: "तुम जो किताब पढ़ रही हो, क्या वो अच्छी है? — खिड़की वाली सीट से।" अगले दिन, अर्जुन की किताब में एक चिट मिली: "बहुत अच्छी है। पर मैंने देखा है — तुम किताब कम, इधर-उधर ज़्यादा देखते हो। ध्यान लगाओ। — कोने वाली सीट से।" अर्जुन को हँसी आ गई। फिर शुरू हुआ चिट्ठियों का सिलसिला — रोज़, किताबों के बीच। बातें — पढ़ाई की, फिल्मों की, खाने की, सपनों की। तीन हफ़्ते बाद, चिट में लिखा था — "चाय पीने चलोगी? मेरा नाम इशिता है।" अर्जुन ने लिखा — "हाँ। और मेरा नाम अर्जुन है। पर एक बात बता दूँ — मैं लाइब्रेरी पढ़ने नहीं आता था।" इशिता ने जवाब दिया — "मुझे पता है, बुद्धू। इसीलिए तो चाय पर बुला रही हूँ।" उस शाम कैंटीन में दो कप चाय, ढेर सारी बातें, और एक नई शुरुआत हुई। कॉलेज ख़त्म हुआ। नौकरियाँ अलग शहरों में लगीं। दो साल लॉन्ग डिस्टेंस चला। मुश्किल था — पर दोनों ने निभाया। आज दोनों बैंगलोर में साथ रहते हैं। घर में एक पूरी दीवार किताबों से भरी है। और हर किताब के बीच — एक पुरानी चिट रखी है। इशिता कहती है — "हमारी लव स्टोरी किताबों में लिखी है — सच में।"